Gorakhpur News: केंद्र सरकार के निर्देशानुसार वक्फ संपत्तियों को लेकर एक बड़ा अभियान चुपचाप शुरू कर दिया गया है। केंद्रीय एजेंसी की टीम पूर्वांचल के कई जिलों में वक्फ संपत्तियों की निगरानी कर रही है। जांच का दायरा सिर्फ वक्फ घोषित जमीनों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इन जमीनों पर अब तक हुए सभी निर्माण, व्यावसायिक उपयोग, बिक्री, सब-लीज और दस्तावेजों की भी बारीकी से जांच की जा रही है। इस बीच, शासन को भेजी गई रिपोर्ट में गोरखपुर मंडल के छह जिलों में 2,551 सरकारी संपत्तियों की पहचान की गई है, जिन्हें अवैध रूप से वक्फ घोषित कर कब्जा कर लिया गया था।
दरअसल, इस रिपोर्ट को तैयार करते समय मस्जिदों और मदरसों जैसी धार्मिक संस्थाओं को जांच से बाहर रखा गया है। टीम वक्फ घोषित की गई और वाणिज्यिक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल की जाने वाली भूमि पर ध्यान केंद्रित कर रही है। इन जमीनों पर होटल, शोरूम, कॉम्प्लेक्स और यहां तक कि आवासीय निर्माण भी किए गए हैं।
1366 से 1795 तक के अभिलेखों से जानकारी
गोरखपुर जिले में जांच के दायरे में आने वाली संपत्तियों में फसली वर्ष 1366 से 1795 तक के अभिलेख हैं। ये राजस्व अभिलेख उर्दू में हैं, लेकिन इनकी हिंदी प्रतियां तैयार की जा रही हैं। इसमें नवाब असीउद्दौला और राजा सत्तासी द्वारा धार्मिक उद्देश्यों के लिए दी गई भूमि का उल्लेख है। इसमें मौजा उनोसा से लेकर वर्तमान डीआईजी बंगला रोड (कालेपुर क्षेत्र) तक फैले 16 गांव शामिल हैं।
आजादी के बाद इन जमीनों को गलत तरीके से वक्फ घोषित कर दिया गया और बाद में पंजीकृत कर दिया गया। जांच एजेंसियों को संदेह है कि इनमें से कई कार्य कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किए बिना किए गए थे और कुछ जमीनों को उप-पट्टे पर देकर ऊंची कीमतों पर बेच दिया गया था।
गोरखपुर शहर में ऐसे 16 स्थान चिन्हित किये गये
वक्फ संपत्ति के साथ-साथ अब जांच का दायरा शत्रु संपत्ति तक भी बढ़ गया है। 1947 में देश के विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गए लोगों की संपत्ति को ‘शत्रु संपत्ति’ घोषित कर दिया गया। ये संपत्तियां केन्द्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में मानी जाती हैं तथा इनके संरक्षक जिला मजिस्ट्रेट होते हैं।
अब तक, गोरखपुर शहर में 16 शत्रु संपत्तियों की पहचान की गई है, जो घासी कटरा, इलाहीबाग, निज़ामपुर, सदर, मोहद्दीपुर, नयागांव, तुर्कवलिया, पिपराइच, बांसगांव और करमहा बुजुर्ग जैसे क्षेत्रों में फैली हुई हैं। इनमें से कई संपत्तियां वाणिज्यिक और आवासीय उद्देश्यों के लिए उपयोग में लाई गई हैं। इनके रिकार्ड तैयार कर सरकार को सौंप दिए गए हैं।
वक्फ के नाम पर सीलिंग कानून में भी भ्रम की स्थिति
1956 में जब गोरखपुर को प्रथम श्रेणी की नगर पालिका घोषित किया गया तो शहर में जमीन का खेल शुरू हो गया। जमींदारी उन्मूलन के निर्णय के कारण सरकार के नाम पर पंजीकृत कई जमीनों को वक्फ घोषित कर दिया गया। इस प्रक्रिया में सीलिंग कानून की भी अनदेखी की गई।
कई भूमियों को संरक्षक की जानकारी के बिना ही उप-पट्टे पर दे दिया गया। नियमानुसार, यदि किसी शत्रु संपत्ति को पट्टे पर दिया जाना है तो जिलाधिकारी की संस्तुति के बाद राज्य सरकार के माध्यम से राज्यपाल से मंजूरी ली जाती है। लेकिन जांच से पता चला है कि जमीनों को बिना किसी दस्तावेज के बेच दिया गया और भारी मुनाफा कमाया गया।
शासन स्तर पर रिपोर्ट, कार्रवाई की तैयारी
गोरखपुर समेत छह जिलों में चिन्हित वक्फ अतिक्रमणों की रिपोर्ट शासन को भेज दी गई है। अगले चरण में इन जमीनों पर अवैध अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की जा सकती है। इसके अलावा, व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल की जाने वाली वक्फ संपत्तियों के खिलाफ कार्रवाई करने की योजना तैयार की जा रही है।
राजस्व एवं नगर निगम विभाग से संबंधित पुरानी फाइलों की जांच का काम तेज कर दिया गया है। जिला प्रशासन से पुराने रिकार्ड भी मांगे गए हैं। एजेंसी उन लोगों की भी पहचान कर रही है जिन्हें इन मामलों से व्यक्तिगत रूप से लाभ हुआ है। माना जा रहा है कि इस पूरे मामले में जल्द ही कई खुलासे हो सकते हैं।