Basti News: संविदा कर्मचारी की तनख्वाह रोके जाने पर मुख्य सचिव को फटकार, 11 नवंबर से पहले भुगतान का आदेश

Basti News: संविदा कर्मचारी की तनख्वाह रोके जाने पर मुख्य सचिव को फटकार, 11 नवंबर से पहले भुगतान का आदेश

Basti News: एक संविदा कर्मचारी ने सरकार को एक बार फिर कठघरे में खड़ा कर दिया है। उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी सुधीर कुमार यादव ने अपनी तनख्वाह न मिलने के कारण हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने महिला कल्याण और बाल विकास की प्रमुख सचिव, लीना जोहरी, को फटकार लगाते हुए आदेश दिया कि सुधीर की तनख्वाह 11 नवंबर से पहले जारी की जाए।

मामला क्या है?

सुधीर यादव, जो बस्ती के निवासी हैं, को प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के तहत स्वास्थ्य विभाग में संविदा पर नियुक्त किया गया था। 8 जून, 2023 को, तत्कालीन मुख्य सचिव ने मानव साक्षरता विशेषज्ञ के पद को समायोजित किया था। स्वास्थ्य विभाग ने 2018 से जून 2023 तक लगातार उन्हें मानदेय दिया, लेकिन समायोजन के बाद, महिला कल्याण विभाग ने जुलाई 23 से मार्च 24 तक उपस्थिति के आधार पर तनख्वाह दी।

तनख्वाह रोकने का मामला

सुधीर यादव की तनख्वाह 24 अप्रैल से बिना किसी कारण के रोक दी गई। इस स्थिति से परेशान होकर, उन्होंने हाई कोर्ट का रुख किया। 29 अगस्त, 2024 को, हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए आदेश दिया कि उनकी तनख्वाह तीन सप्ताह के भीतर दी जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि ऐसा करना संभव न हो, तो Basti के DM, जिला कार्यक्रम अधिकारी और CMO व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करें। हालांकि, कोर्ट के आदेश के बावजूद, सुधीर को तनख्वाह नहीं मिली।

Basti News: संविदा कर्मचारी की तनख्वाह रोके जाने पर मुख्य सचिव को फटकार, 11 नवंबर से पहले भुगतान का आदेश

सरकार की ओर से हलफनामा

सरकार की ओर से एक हलफनामा दाखिल किया गया, जिस पर फिर से 26 सितंबर 2024 को सुनवाई हुई। इस बार कोर्ट ने सरकार के प्रति अपनी नाराजगी व्यक्त की और हलफनामा को खारिज कर दिया। कोर्ट ने महिला विकास विभाग को आदेश दिया कि 4 अक्टूबर से पहले सुधीर की तनख्वाह का भुगतान किया जाए। कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि यदि ऐसा नहीं किया गया, तो वे न्यायिक प्रक्रिया अपनाएंगे। इसके बाद भी सुधीर की तनख्वाह नहीं मिली।

कोर्ट की सख्ती

इसके बाद, 24 अक्टूबर को फिर से सुनवाई हुई। इस बार न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर ने सरकार के रवैये पर कड़ी निंदा की। कोर्ट ने प्रमुख सचिव को बताया कि आप अपनी जिम्मेदारियों को ठीक से निभाने में असमर्थ हैं, इसलिए अगली सुनवाई पर किसी अन्य प्रमुख सचिव को हलफनामा लेकर आना चाहिए। इस पर प्रमुख सचिव लीना जोहरी ने हलफनामा दिया और कहा कि याचिकाकर्ता की नियुक्ति अस्थायी थी और 31 मार्च 2019 के बाद इसकी अवधि बढ़ाई नहीं गई है। इसलिए, तनख्वाह नहीं दी जा सकती।

याचिकाकर्ता का विरोध

इस पर याचिकाकर्ता ने विरोध किया कि न तो उन्हें इस संबंध में कोई सूचना दी गई और न ही संबंधित आदेश जारी किया गया। याचिकाकर्ता लगातार अपनी सेवा कर रहा है, जिसकी उपस्थिति को CMO बस्ती द्वारा प्रमाणित किया गया है। इसके साथ ही, सितंबर तक तनख्वाह के भुगतान के लिए सरकार को पत्र भी भेजा गया है। इसके बाद, कोर्ट ने दूसरे प्रमुख सचिव से इस मामले में हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया और पूछा कि सरकार कर्मचारी की तनख्वाह के भुगतान से संबंधित किस प्रक्रिया का पालन कर रही है।

इस मामले ने उत्तर प्रदेश सरकार के कर्मचारियों के लिए एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। हाई कोर्ट की सख्ती यह दर्शाती है कि सरकारी कर्मचारियों के अधिकारों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इससे पहले भी कई बार ऐसे मामलों में सरकार को कोर्ट के आदेशों का पालन करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। यह स्थिति न केवल सरकारी कर्मचारियों के लिए चिंता का विषय है, बल्कि इससे सरकार की छवि पर भी असर पड़ता है।

सरकार को चाहिए कि वह अपने कर्मचारियों के लिए समय पर वेतन सुनिश्चित करे ताकि वे अपनी सेवाएं बेहतर तरीके से प्रदान कर सकें। संविदा पर काम कर रहे कर्मचारियों को भी उनके हक के लिए लड़ने का साहस मिलना चाहिए।

अगला कदम

अब देखना यह है कि सरकार कोर्ट के आदेश का पालन करती है या नहीं। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो आगे और कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। यह मामला सभी संविदा कर्मचारियों के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है कि उन्हें अपने अधिकारों के लिए लड़ने का साहस रखना चाहिए।

इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि सरकारी विभागों में सुधार की जरूरत है और उन्हें अपने कर्मचारियों की भलाई के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।

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