Gorakhpur: रामगढ़ताल की सुंदरता को बढ़ाने और पर्यटकों को एक नया आकर्षण देने के लिए लाए गए अमेरिकन व्हाइट बत्तखों की संख्या में अब भारी गिरावट आई है। लगभग 1000 बत्तखों को दक्षिण भारत से लाकर तालाब के वातावरण में छोड़ने का सपना बुरी तरह से टूट चुका है। अब वहां केवल 150 बत्तखें ही बची हैं, जो अपनी जीवनरक्षा के लिए संघर्ष कर रही हैं। इस स्थिति का मुख्य कारण उचित देखभाल का अभाव और लापरवाही माना जा रहा है। कुछ लोग कहते हैं कि बत्तखें गर्मी सहन नहीं कर पाई, तो वहीं स्थानीय लोगों का कहना है कि बत्तखों का शिकार किया गया है।
बत्तखों के मरने की वजह
रामगढ़ताल में बत्तखों को लाने का उद्देश्य था कि यह तालाब एक नया पर्यटक स्थल बने, और यहाँ की सुंदरता में चार चाँद लगें। बत्तखों को लाने का जिम्मा ई-सिटी बायोस्कोप एंटरटेनमेंट प्राइवेट लिमिटेड नामक मुम्बई स्थित कंपनी पर था, जिसने प्रति बत्तख 600 रुपये खर्च करके इन बत्तखों को लाने का काम किया था। लेकिन गर्मी के कारण यात्रा के दौरान 300 बत्तखों की मौत हो गई और 150 बत्तखें रामगढ़ताल पहुंचने के बाद ही कुछ ही दिनों में मर गईं। इसके बाद, जिन कर्मचारियों को इन बत्तखों की देखभाल के लिए नियुक्त किया गया था, उन्होंने बत्तखों को यहाँ के मौसम के हिसाब से ढालने की कोशिश की।
जब बत्तखें थोड़ी बड़ी हो गईं, तो उन्हें कुछ घंटों के लिए तालाब में छोड़ दिया गया। यह दृश्य पर्यटकों को बहुत आकर्षित करता था और बड़ी संख्या में लोग बत्तखों को तालाब में इधर-उधर घूमते हुए देखने के लिए जमा हो जाते थे। लेकिन जैसे-जैसे बत्तखें बड़ी होने लगीं, बत्तखों की देखभाल करने वाला युवक हटा दिया गया और बत्तखें अब पूरी तरह से स्वतंत्र हो गईं।
बत्तखों का शिकार और सुरक्षा की कमी
स्थानीय लोग बताते हैं कि बत्तखें रात के समय इधर-उधर दौड़ते हुए बहुत शोर मचाती थीं। जब लोग वहां पहुंचे तो उन्होंने देखा कि कुत्ते बत्तखों का पीछा कर रहे थे। इसके अलावा, कुछ लोग बत्तखों का शिकार भी कर रहे थे। गाँव के लोग उन्हें पकड़कर ले जाते थे। स्थानीय लोगों का आरोप है कि बत्तखों के लिए कोई उचित सुरक्षा व्यवस्था नहीं की गई थी।
विशेषज्ञों की सलाह
प्राकृतिक जीवन और पक्षियों के विशेषज्ञों का कहना है कि बत्तखों के लिए तालाब में एक सुरक्षित स्थान और अच्छी देखभाल की आवश्यकता थी। बत्तखों को खाना और रहने की सही व्यवस्था मिलनी चाहिए थी। उन्हें रात के समय सुरक्षा के लिए एक बंद और सुरक्षित स्थान में रखा जाना चाहिए था, ताकि वे शिकारियों और जानवरों से बच सकें। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि इस प्रकार की बत्तखों का रख-रखाव चिड़ियाघर में किया जा सकता है, तो रामगढ़ताल में भी उनके लिए सुरक्षा के बेहतर उपाय किए जा सकते थे।
बत्तखों को खिलाने का प्रयास
आदित्य सिंह, जो भट चौराहा, तरामंडल के निवासी हैं, बताते हैं कि वे अपनी कुछ दोस्तों के साथ रात के समय बत्तखों को उबला हुआ चावल खिलाने जाते हैं। आदित्य ने बताया कि वे अपनी एनिमल वेलफेयर संस्था के माध्यम से सड़क पर घूमने वाले मूक जानवरों की सेवा करते हैं। आदित्य का कहना है कि वे अपनी ओर से बत्तखों को भूखा नहीं रहने देते, लेकिन यह भी स्वीकार करते हैं कि अगर बत्तखों के लिए रात में कोई सुरक्षा व्यवस्था होती, तो उनकी जिंदगी खतरे में नहीं पड़ती।
पानी के खेल का संचालन करने वाला युवक
आशीष शाही, जो रामगढ़ताल में जल क्रीड़ा का संचालन कर रहे हैं, ने बताया कि कुछ बत्तखें यहाँ के मौसम के कारण मर गईं। जैसे ही ये बत्तखें बड़ी हुईं, वे रामगढ़ताल में इधर-उधर घूमने लगीं। शुरू में, बत्तखों की गिनती करना मुश्किल था क्योंकि वे झुंड में रहती थीं। लेकिन जैसे ही उनकी संख्या में कमी आनी शुरू हुई, एक निगरानी रखने वाला कर्मचारी नियुक्त किया गया। इसके बाद पता चला कि गाँव के कुछ लोग बत्तखों का शिकार कर रहे थे। एक लड़के को चार बत्तखों के साथ पकड़ा गया। इस पर तत्काल पुलिस ने कार्रवाई की और संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की गई।
बत्तखों की संख्या और भविष्य
वर्तमान में रामगढ़ताल में लगभग 200 बत्तखें बची हैं, जो अब तालाब से लेकर झील के किनारे तक अपना जीवन बिता रही हैं। इन बत्तखों का मुख्य आहार अब तालाब के मछलियाँ बन गई हैं, और यहाँ आने वाले लोग भी उन्हें खिलाने का काम करते हैं। लेकिन अगर इस स्थिति को जल्द सुधारने के प्रयास नहीं किए गए, तो बत्तखों की संख्या और घट सकती है।
वन विभाग की कार्रवाई
वन विभाग के उप वन अधिकारी डॉ. हरेंद्र सिंह ने बताया कि बत्तखों के शिकार के बारे में किसी ने शिकायत नहीं की है। उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र गोरखपुर विकास प्राधिकरण (GDA) के तहत आता है। यदि किसी व्यक्ति ने शिकायत की, तो साक्ष्य और प्रमाण के आधार पर जांच के बाद उचित कार्रवाई की जाएगी।
रामगढ़ताल में लाए गए अमेरिकन व्हाइट बत्तखों की संख्या में भारी गिरावट ने न केवल पर्यटकों को दुखी किया है, बल्कि इस परियोजना से जुड़े अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े किए हैं। अगर बत्तखों की सुरक्षा और देखभाल के लिए उचित कदम नहीं उठाए गए, तो इस खूबसूरत परियोजना को बर्बाद होते देखा जा सकता है। अब यह जरूरी हो गया है कि सरकारी और प्राइवेट अधिकारियों को मिलकर इस समस्या का समाधान करें और बत्तखों के लिए एक सुरक्षित वातावरण प्रदान करें, ताकि भविष्य में इस प्रकार की समस्याएं न हों।